चमच ओर दो बूँद तेल से सुख का रहश्य (Inspirational stories)
चमच ओर दो बूँद तेल से सुख का रहश्य
सालों पहले की बात हैं एक व्यापारी ने अपने बेटे जय (काल्पनिक नाम) को सुख ओर आनंद का महत्व जानने के लिए एक विद्वान के पास भेजा विद्वान का निवास रेगिस्तान में था। जय रेगिस्तान में चालीस दिन तक उस विद्वान के स्थान की खोज करता रहा।आखीर में उसे पता मिल गया विद्वान रेगिस्तान में एक पहाड़ की चोटी पर बने सुंदर भवन में रहता था।जय उस भवन मे उत्साहित होके प्रवेश करता हैं।
जब हमारी कहानी का किरदार भवन के मुख्य कक्ष में पहूचा तब उसे वो साधु के दर्शन नहीं हुए जिस की तलाश में वो आया था बल्कि वहाँ पे बहुत चहल-पहल हो रही थी। व्यापारी ओर बाक़ी सब लोग एक दूसरे से भिन्नभिन्न समुह बना के बात-चीत कर रहे थे। कक्ष में मंद मंद संगीत की धुन फैलीं हुई थी। बीच में एक टेबल था जिस पर स्वादिष्ट आहार रखा हुवा था। बाद मे जय को पता चला कि साधुमहाराज अतिथीयो से बात करने में व्यस्त थे।दो घंटे के बाद जय की साधुमहाराज से मुलाक़ात हुई।
विद्वान बहुत चतुर थे।उन्होंने जय के वहाँ पे आने का कारण जान लिया साधु महाराज बोले “ जय अभी तो मेरे पास वो रहश्य कहने का समय नहीं हैं तुम एक काम करो तुम महेल में थोड़ा घूम-फिर लो उसके बाद दो घंटे के बाद वापस आओ।”
परंतु जय तुम्हें एक काम करना पड़ेगा।उसके बाद साधु ने जय को एक चमच दी जिस में दो बूँद तेल था।साधु ने कहा “ध्यान रखना जय तुम महल में घूम सकते हो पर ध्यान रखना यह तेल चमच से गिर ना नहीं चाहिए” जय ने साधु की बात को एक परीक्षा की तरह लिया ओर हाथ में चमच ले के महल में घूमने लगा ।
जय महल की दादर चड-उतर ने लगा पर उसका ध्यान बस चमच मे रखे तेल पर ही था। महेल में घूमते समय उसका पूरा ध्यान बस चमच में रखे तेल पर यानी अपने लक्ष्य पर था।दो घंटे बाद जय महेल के मुख्य कक्ष में आया जहाँ पे साधु महाराज बिराजमान थे।
जय की आँखों देख कर साधुमहाराज हल्के से मुस्कुराय।बाद मे साधु महाराज बोले “जय तुम महेल घूम के आय हो तो तुमने भोजन कक्ष मे लटकती हुई पर्शियन जाज़म को तो देखा ही होगा। क्या तुम ने बग़ीचे देखे ? जिससे बनाने में मेरे माली को 10 साल लगे ।मेरी लाइब्रेरी में रखी सुंदर हस्तप्रस्त और किताबें देखी ही होगी।
जय थोड़ा सर्माया ओर उसके बाद क़बूल किया की उसने कुछ ख़ास खंडो का निरीक्षण नहीं किया हैं।ऐसा इसलिए हुवा की उसका संपूर्ण ध्यान तेल की बुंदो यानी की अपने लक्ष्य पर था।विद्वान ने जय को एक और बार अपने महेल का चक्कर लगाने का सुझाव दिया। और बोले की “जिसका निवास अच्छी तरह से देखा न हो उसका भरोसा नहीं करना चाहिए”|
अब जय उत्साहित होके एक ओर बार महल घूमने गया। इस बार जय ने भोजन कक्ष की पर्शियन जाज़म ,बग़ीचे का क़ुदरती सोंदर्य देखा अंत में उसने पुस्तकालय में हस्तप्रत ओर पुस्तक भी देखे ।उसके बाद जय मुख्य कक्ष में आता है और विद्वान को देखी गई चिजो का वर्णन करता हैं।विद्वान बोले “जय मेने तुम्हें जो चमच में तेल के दो बूँद दिए थे वो कहा हैं ? जय ने चमच की और देखा वहाँ पे तेल नहीं था ।
आख़िर में संत बोले में तुम्हें एक ही सीख दे सकता हूँ की
“सुख का रहश्य हैं कि:
दुनिया का सोंदर्य देखना और दो बूँद तेल को नहीं भूलना।”
सिख:
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